मैँ अब मँजुनाथ को भूलना चाहता हूँ :- रामेँद्र जनवार

लखीमपुर खीरी / जी हाँ आज उन्नीस नवँबर की वही तिथि है , वर्ष 2005 मेँ इसी तिथि को लखीमपुर खीरी जनपद मेँ तैनात इँडियन आयल कार्पोरेशन के युवा विपणन अधिकारी एस. मँजुनाथ की पेट्रोलियम माफिया ने अपने गुर्गोँ के साथ मिलकर हत्या कर दी थी और उनकी लाश उसी रात पडोसी सीतापुर जनपद के महोली कस्बे मेँ सडक पर  पुलिस ने कार मेँ बरामद की थी । हमेँ खासतौर पर आज मँजुनाथ की याद इसलिए भी आती है क्योँकि स्थानीय पेट्रोलियम माफिया जिसने उनकी हत्या की उसके स्थानीय सम्बँधोँ और असर के चलते मँजुनाथ की हत्या की खबर सार्वजनिक होने के बाद भी इसके विरोध मेँ राजनीतिक दलोँ और नेताओँ की प्रतिक्रिया न के बराबर थी जबकि एक उद्देश्य के लिए अपनी जान देने वाले युवा अधिकारी की हत्या को लेकर जनमानस मेँ उत्कँठा और आक्रोश दोनोँ चरम पर थे । दूसरा यह कि हत्या के बाद उसके कारणोँ को सँदिग्ध बनाने और लीपापोती करने के लिए मँजुनाथ के एक अवैध सँबँध की चर्चा भी लोगोँ मेँ फैलाने की कोशिश की गई लेकिन ऎसे मेँ लखीमपुर के मुट्ठी भर बुद्धिजीवी आगे आए और साहित्य मेँ ‘ शहर कोतवाल की कविता ‘ फेम कथाकार डा. देवेन्द्र के आवास पर एक बैठक बुलाई गई और उनकी अगुआई मेँ मामले की सीबीआई जाँच की माँग को लेकर शहर की सडकोँ पर मार्च निकाला गया और इसी माँग के साथ राष्ट्रपति को पत्र भेजने की मुहिम भी छेडी गई । खैर इस मामले मेँ मीडिया की सक्रियता के चलते पुलिस तुरँत हरकत मेँ आई और हत्यारों को गिरफ्तार किया , उन्होने अपना जुर्म भी कुबूला और हाई प्रोफाइल मामला बन जाने के कारण न्यायिक सक्रियता भी बढी. तथा लगभग नौ साल के अर्से मेँ न्यायालय ने सभी प्रक्रियाएँ निपटाते हुए हत्यारोँ को सजा भी सुना दी । हत्यारोँ को सजा होने के बाद भी यह सवाल आज भी हमारे जेहन मेँ दस्तक देता रहता है कि मँजुनाथ ने एक मकसद के लिए अपनी जान गवाँई थी और वह मक़सद था पेट्रोलियम पदार्थोँ मेँ मिलावटखोरी रोकना , मिलावट के लिए चोरी छुपे चलाए जा रहे अवैध डिपो बँद करवाना , पेट्रोल पँपोँ पर घटतौली बँद करवाना आदि लेकिन क्या मँजुनाथ की हत्या के दस साल बीतने के बाद भी क्या पेट्रोलियम मँत्रालय , कँपनियाँ और उनके अधिकारी इस मक़सद को हासिल करने मेँ कामयाब हो पाए ? एक ही जवाब भी हमारे जेहन मेँ आता है कि नहीँ ! औपचारिकता के नाते हर पेट्रोल पँप पर एक नपैना रखा जाता है लेकिन घटतौली बदस्तूर जारी है । क्षेत्रीय विपणन अधिकारी का मोबाइल नँबर हर पँप पर सामने लिखा जाता है लेकिन शिकायतोँ पर जाँच और कार्रवाई होने की सूचना किसी को शायद ही मिलती है । खरीद की रसीद बहुधा माँगने पर ही मिलती है । कस्बोँ गाँवोँ तक मेँ पुलिस की पुश्तपनाही मेँ मिलावटी पेट्रोल सडकोँ के किनारे ही नहीँ , परचून की दूकानोँ पर भी खुलेआम बिक रहा है । अवैध डिपो चलाए जाने की खबरेँ गाहे बगाहे आती ही रहती हैँ । अगर मँजुनाथ के जान देने का मकसद ही अनदेखा किया जा रहा हो तो हर उन्नीस नवँबर को उनको याद करने का भी मुझे तो कोई औचित्य नज़र नहीँ आता । इसीलिए मुझे लगता है कि अब मँजुनाथ को भूल जाना ही बेहतर होगा ।

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